Tuesday, 24 January 2017
DAKSH BHARAT: क्या सच में उत्तर प्रदेश है उम्मीदों का प्रदेश ?
DAKSH BHARAT: क्या सच में उत्तर प्रदेश है उम्मीदों का प्रदेश ?: हर बार तुम्हें डराकर करीब लाएंगे - जाति और मजहब का नया वजूद सिखाएंगे! हम तुम्हारे भले के लिए हर नया स्वांग रचाएंगे - तुम रहो फ़क़ीर ऐसा ...
Thursday, 19 January 2017
क्या सच में उत्तर प्रदेश है उम्मीदों का प्रदेश ?
हर बार तुम्हें डराकर करीब लाएंगे - जाति और मजहब का नया वजूद सिखाएंगे!
हम तुम्हारे भले के लिए हर नया स्वांग रचाएंगे - तुम रहो फ़क़ीर ऐसा हम गठजोड़ बनाएंगे!
जी उपर्युक्त पंक्तियां उत्तर प्रदेश की वास्तविकता की झलक हैं, उत्तर प्रदेश की प्रचारित तस्वीर आजकल हर होर्डिंग और प्रचार में उत्तम प्रदेश है और उसके मुखिया अखिलेश यादव प्रदेश के इतिहास में सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं उपर्युक्त लाइनों में यह भी संकेत है कि ऐसी क्या मज़बूरी आन पड़ी की प्रदेश में सिर्फ़ पारिवारिक सीट तक सिमटी कांग्रेस से उत्तम प्रदेश का युवा मुख्यमंत्री गठबंधन कर रहा है?
उत्तर प्रदेश की जनता के साथ बड़े ही सुनियोजित तरीके से पिछले ३० सालों से जातिवाद का अफीम देकर कभी इस करवट तो कभी उस करवट बैठने का कुत्सित खेल ही रहा है और जनता भी उसी नशे में चूर हो जाना चाहती है। २०१४ के लोकसभा चुनाव ने जनता में रच बस गए जातिवाद को डिगाया तो लेकिन अभी तक वह ध्वस्त नहीं हुआ है।
आगामी विधान सभा चुनाव में जातीय समीकरण व् धर्म का एक बार फिर भरपूर उपयोग होगा ये लगभग तय है। जनता के मन में इस समय क्या चल रहा है इसका कोई खास सर्वे का तरीका न तो किसी न्यूज एजेन्सी के पास है न ही राजनीतिक दलों के पास। समाजवादी पार्टी अभी तक यादवों व् मुसलमानों के बुते चुनावी समर में अपना वर्चस्व दिखाती आयी है वहीँ प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी हरिजनों और समाज के निचले तबके के वोटरों को गोलबंद करके सरकार बना चुकी है।
प्रदेश के विकास की बात अगर करें तो पिछले दो दशकों से न कोई ठोस रोजगार सर्जन की पहल हुयी है न ही बुनियादी सुविधाओं में कोई इजाफा हुआ है। इजाफा अगर हुआ है तो जातीय कट्टरता और धार्मिक दंगे। महिला सुरक्षा तो दोयम दर्जे की है ही और पुलसिया रवैया भी जातीयता के सड़ांध का अड्डा बन गया है।
अखिलेश यादव जब मुख्यमंत्री बने तो उत्तर प्रदेश के यौवन को उनसे बड़ी उम्मीदें थी उस उम्मीद को पूरा करने में नाकाम रहे मुख्यमंत्री ने उसे प्रचार की लाइन ज़रूर बना दी "उम्मीदों का प्रदेश" सच में उम्मीदों को अभी भी पाल रहे रहें है देश के करोड़ों युवा लेकिन सरकारें उन्हें झुनझुना ही पकड़ती आयी हैं वर्त्तमान सरकार ने युवाओं को लैपटॉप का झूनझूना पकड़ाया तो लेकिन उसे में सभी हितग्राहियों तक पहुँचाने में नाकाम रहे और २१ वीं सदी में उन्हें पुराने व् घटिया लैपटॉप कुछ लोगों को बांटकर तस्वीरों का संकलन व् ख़बर बनाने से ज़्यादा के उदेश्य को पूरा नहीं कर पाए! मिडिया भी उनके द्वारा किये गए कार्यों की समीक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखता वह तो मुलायम के धोबिपछाड़ व् अखिलेश की शह व् मात को खबर की तरह नहीं प्रचार की भाँती चलाने को मजबूर-सा दिखता है!
प्रदेश के शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बिजली, पेयजल, सिंचाई जैसी बुनियादी सुविधाओं की और किसी की भी नजर नहीं जाती प्रदेश में सड़क व् सिंचाई के विभागों में सर्वाधिक भ्रष्टाचार का आलम वर्तमान सरकार में रहा है! लेकिन इन सब मुद्दों को न राजनीतिक दल उठाते है न ही हमारा चौथा खम्भा जिसे जनतंत्र के प्रहरी की जिम्मेदारी समाज ने दे रखी है! आपराधिक नेताओं की एक लम्बी फेहरिस्त आपको उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दलों में देखने को मिल जाएगी लेकिन सभी दलों के भाषण व् प्रचार में अपराध मुक्त-उत्तर प्रदेश का स्लोगन भी देखने को मिल जायेगा!
प्रदेश के मतदाता इस बात को समझते नहीं है या लोग समझने नहीं दे रहे हैं, धर्म के नाम पर और जाति के नाम पर गोलबंदी इसी का एक क्रूरतम हिस्सा है इस क्रूर चहरे को जनता को पहचानना होगा और जाति-समुदाय धर्म-संप्रदाय जैसे राजनीतिक अफिमों से इतर जाकर अपने लिए न सही अपने बच्चों के लिए इस राजनीतिक प्रथा का अंत करना होगा!
विकास शब्द का इस्तेमाल वर्तमान समय का सबसे बड़ा शब्द है सभी राजनीतिक दल इसका उपयोग करते नजर आ रहे हैं लेकिन विकास किस चिड़िया का नाम है अभी भी ये उत्तर प्रदेश की जनता के लिए गूढ़ प्रश्न है जिसे जनता पूछने न पाए उसके पहले ही उसे जाति व् संप्रदाय की अस्मिता में उलझा दिया जाता है और वह उलझ जाती है और परिणाम विकास के लिए नहीं जाति और संप्रदाय के गोलबंद के निकल कर आ जाते हैं! यह खेल प्रदेश को सिर्फ़ पीछे नहीं कर रहा बल्कि सामाजिक कलह और विघटन की दरार को दिनोदिन बढ़ा रहा है! सवाल अभी भी वही है कि "उम्मीदों के प्रदेश" से क्या ये उम्मीद पाली जा सकती है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में प्रदेश को इन छद्ममता के मुखौटों से अलग कर पायेगी?
Subscribe to:
Comments (Atom)