Sunday, 24 July 2016

गालियां-महिलाएं-समाज

गाली शब्द का जैसे ही उच्चारण होता है वैसे ही भारतीय समाज में तुरंत माँ-बहन के शब्द असहज ही जेहन में आ जाते हैं। गालियों के प्रचलित मुख्यतः तीन प्रकार हैं, प्रथम में पशुओं के प्रति समर्पित द्वितीय में स्त्रियों के प्रति समर्पित तृतीय में विभिन्न पारिवारिक संबंधों के प्रति समर्पित नज़रों से देखा जा सकता है। 
स्त्रियों पर केंद्रित गलियों को सबसे कटु व् अश्लील माना जाता है। गाली और महिलाओं का सम्बन्ध भी बहुत पुराना है, ऐसा नहीं है कि महिलाओं को लेकर जो गालियां हमारे देश में प्रचलित हैं वो सिर्फ यहीं है जब आप ध्यान से अध्ययन करेंगे तो आप पाएंगे कि यूरोप, अमेरिका या अन्य देशों में भी गालियां दी जाती हैं।
अनसुलझा सवाल ये है कि लोग गाली देते क्यों हैं ? जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ लोग अपनी आत्मसंतुष्टि व् प्रभुता स्थापित करने के लिए भी गाली देते हैं और अपनी ग्लानि, क्रोध को निकालने के लिए भी गाली देते हैं तथागत हास्य-विनोद में भी गाली देते हैं। 
अब कहेंगे कि एक विकसित हो रहे देश-समाज में लोग गाली देना क्यूँ नहीं छोड़ रहे ? तो जबाब यही मिलेगा कि गाली हम सभी लोग देते हैं। हाँ वो अलग बात है कि हम ज्यादा सभ्य हुए तो वेज गाली देते हैं। वेज गलियों को आप ऐसे समझ सकते हैं - कुकुरमुत्ता कहीं के, सूअर, सूअर की औलाद, गधे इत्यादि-इत्यादि। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि आजतक किसी पशु प्रेमी ने आपत्ति तक दर्ज नहीं कराई है कि ये उपरोक्त पशुओं का अपमान है। 
गलियों में सामान्यतया स्त्रियों को केंद्रीत किया जाता है , अब स्त्रियों पर आधारित गलियों का प्रचलन समाज में कब आया इसका कोई मूल व् ठोस ऐतिहासिक जानकारियां तो नहीं हैं लेकिन गलियों के उच्चारण से प्रतीत होता है कि गालियां भी पुरूषवादी सोच से जन्मी हैं। 
हमारे भारत देश में गलियों को लेकर कई सामाजिक परंपराएं व् शिष्टाचार जैसी मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं। प्रायः सभी हिंदी, भोजपुरी, बुंदेलखंडी, बघेली, अवधी भाषा क्षेत्रों में मांगलिक कार्यों में भोजन के वक्त नाम लेकर संबंधों के साथ मिलाकर गाली दी जाती है और इसे हास्य-विनोद गाली के तौर पे समझा व् सुना जाता है, इसीतरह होली के महीनों में फ़ाग व् फगुआ के माध्यम से भी गलियां देने का प्रचलन समाज में है। 
अब प्रश्न यह है कि ....क्या गाली हमारे समाज व् व्यवहार का प्रमुख अवयव है ? प्रश्न यह भी है कि क्या लोग अभीतक मानव सभ्यता के उस पड़ाव तक नहीं पहुँच सके हैं कि गालियां न देनी पड़े चाहे वो हास्य-विनोद हो या वैमनष्यता-क्रोध ? 
मैं इस बात का आह्वाहन भी नहीं कर सकता कि आइये.... हम सब संकल्प लें आज से गलियों से हमारा किसी भी प्रकार से कोई नाता नहीं है और न ही हम गाली देंगे न सुनेंगे। ........अब यक्ष प्रश्न यह है कि मैं हूँ कौन जो आपको यह संकल्प दिलवाऊं कि आप गाली नहीं देंगे ? हाँ मैं ये जरूर कर सकता हूँ कि मैं स्वयं गाली न दूँ लेकिन आपकी गलियों को सुनाता रहूं। 
गाली एक प्रकार से शाब्दिक हिंसा है इसीलिए लोग अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए शाब्दिक हिंसा करते है। एक बात और गाली देने वाले भी समझते है कि वो अनुचित कर रहे हैं लेकिन मानव का स्वभाव प्रभुत्व को बहुत पसंद करता है परंतु वो भूल जाता है कि गलियों से आपके वैचारिक, बौद्धिक व सामाजिक खोखलेपन की तस्वीर उभरकर सामने आती है। जब हम-सब ये समझने लगेंगे तो गलियों का प्रचलन कम करने में सक्षम हो पाएंगे।

Saturday, 23 July 2016

मानवता के दुश्मन

"कश्मीर और हम"

क्या आप सबको मालूम है आज दो ही तरह के कश्मीरी खुशहाल है ? एक वो जो कश्मीर छोड़कर नौकरी करने के लिए हिंदुस्तान के बाकि हिस्सों में जा पहुंचे है, दूसरे वो जिन्होंने पत्थर फिंकवाने का ठेका लिया हुआ है।  

आखिर कौन लोग है जो कश्मीर की आजादी की बात करते हैं किस बला से चाहिए उनको आजादी ? दो उदाहरण आपको देता हूँ आप खुद बा खुद अंदाजा लगाएं (1) गिलानी साहब जो खुद का इलाज दिल्ली में कराते है और बच्चों को विदेशों में सेटल करके यहाँ के गरीब कहें या अशिक्षित या गुमराह होने में आसान लोगों के बच्चों को पत्थर फेंकने के लिए ठेकेदारों के साथ जोड़ते हैं। (2) नए ताजे उमर खालिद जी कश्मीर को आजादी दिलाकर रहेंगे लेकिन खुद शिक्षा लेने दिल्ली में डटे है कई वर्षों से, JNU  से खालिद साहब मास्टर बन रहें है या मास्टर माइंड इसकी झलक अभी से दिखने लगी है। क्या उनको नहीं जाना चाहिए इस्लामाबाद से शिक्षा लेने के लिए ? उन्हें भी तो पता चले की जिस कट्टर पंथी देश की मुहीम का वो समर्थन करते है वहां की शिक्षा व् जीवन का स्तर क्या है।   

अब सवाल उठता है की आजाद कश्मीर की जरूरत किसे है ? कैसी आजादी ? किससे आजादी ? वही कश्मीरियों की बात न जिसमे से आधी आबादी कश्मीर छोड़कर देश के अलग-अलग हिस्सों में जा बसी है  या फिर अलगाववादियों के द्वारा खदेड़ दी गयी है ? या फिर उनको चाहिए जो पाकिस्तान के समर्थन से अमानवीयता का विष कश्मीर में घोल रहे है ? 

बुरहानी पोस्टर बॉय मर गया तस्वीरों में दिखाने के लिए बहुत कुछ है। जैसे लाखों की कीमत वाली बंदूकों के साथ बुरहानी की तस्वीरें सोसल मिडिया में जो वायरल है  क्या बुरहानी या अन्य जो भी लोग इस्लाम के लिए काम करते हैं उन्हें ये महंगे हथियार अल्लाह उपलब्ध कराता है या पाकिस्तान ? 

अब आर्मी की बात करें तो देश की आर्मी किसी दूसरे ग्रह से नहीं आई है जो मानवता को नष्टकर रही है।  जब बुद्धिजीवी लोग डिबेट में कह रहे होते हैं कि सेना कश्मीर  में अन्याय कर रही है तब कोई सेना का जवान आतंकवादियों के किसी ग्रेनेड या AK47 के निशाने पर होता है।  हम कैसे बुद्धिजीवी हैं  उस सेना को कैसे भूल जाते हैं जो बाढ़ में फसें एक-एक कश्मीरियों की जान बचाने के लिए जान जोखिम में डालकर उन्हें बचाती है ! 

दरअसल मैं कश्मीर की समस्या पर कोई समाधान, हल या फैसला नहीं दे सकता लेकिन जो भी लोग बुरहानी या अलगाववाद या आतंकवाद के समर्थकों के पक्ष में बातें करते हैं मसलन इंसानियत और मानवता के हितैषी तो नहीं हो सकते। जो लोग ये कह रहे हैं ये कुछ भटके हुए नौजवान है उन्हें समझा बुझाकर रस्ते पे लाया जा सकता है दरअसल जो लोग इस तरह बोल रहे है समझना उन्हें होगा कि वो भटके हुए नहीं बकायदे प्रशिक्षित व् प्रायोजित हैं।  

सभी बुद्धि के हिमालयों से अनुरोध है कृपया मानवता के लिए कश्मीर की वादियों को जलने के लिए अपने शब्दकोष का प्रयोग न करें और कदाचार को सम्प्रेषित न करें। एक बात और पत्तर फेंकने वाले न तो आपके अंग्रेजी सम्पादकीय पढ़ते है न ही आपकी प्राइम टाइम डिबेट सुनते है वो सिर्फ और सिर्फ इस्लाम के नाम पर उन अलगाववादियों और आतंकवादियों के गतिविधियों के शिकार है जो खुद के बीबी बच्चों को हिंदुस्तान और अन्य अमन पूर्ण देशों में रखते हैं और घाटी के गरीब या अशिक्षित यौवन को आतंक के लिए मरने-मारने के लिए प्रेरित करते हैं।

"दुनिया में खूबसूरत झीलों की घाटी की सैर और पर्यटन से सुंदर जीवन और रोजगार के लिए प्रेरणा न देकर पत्थर और बन्दुक उठाकर पैसे कमाने का जो हुनर अमन के दुश्मनों ने कश्मीर में घोला है उसे कम से कम बुद्धिजीवी न घोलें तो बेहतर होगा।"